वृंदावन गोकुल का ग्वाला
सेतुबंध के उस पार क्षितिज मिलता था अवनी के दिशालोक में सबकुछ एक दिये के प्रकाश का लाल - केसरिया बिम्ब सागर तट के बीचोंबीच मानों अभी उदित हुआ है क्षणभर का यह दृश्य विस्फारित , श्रुति सी यात्रा के सतत पड़ाव पर अथक आई साथ एक खुली श्वास - निश्वास में सदियाँ समेटे उसकी शांत संतोष सुकून बिलगाव से दूर निश्छल मुस्कान