क्यों साँवरों ?
जब शब्द हारे
कुछ कहना न जाने
मुख बोल न कभी पहचाने
तुम तब भी समझ लेते
मेरी सारी बातें
ओ कृष्ण क्या मेरा मौन
तुम्हारी बंशी का गीत है
जिसको तुम ही जानो - पहचानो
क्यों साँवरों ?
वृंदावन तट रेनू ... मन से जो पास हो । वहाँ बन्धन तुच्छ हो जाते है । सीमाएँ भी तभी तक रहती है जब तक हृदय कलुष से छूटकर प्रेमभाव की वृहत्तर भूमि प्राप्त नहीं कर लेता है और त्याग व करुणा की मृदुल हितभूमि से जब उसका संबंध स्थापित हो जाता है तब वह और भी प्रगाढ़ हो जाता है अपनी कटु प्रवृत्तियों से ऊपर उठकर ही जीवन का वास्तविक रसानंद प्राप्त हो सकता है । यह हृदय की सच्ची अनुभूति है । यहाँ पर आसाधरणत्व का कोई स्थान नहीं मन से जो पास हो वहाँ फिर दूर नहीं ।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें