वृंदावन गोकुल का ग्वाला
सेतुबंध के उस पार क्षितिज मिलता था
अवनी के दिशालोक में सबकुछ एक
दिये के प्रकाश का लाल - केसरिया बिम्ब
सागर तट के बीचोंबीच मानों अभी उदित हुआ है
क्षणभर का यह दृश्य विस्फारित , श्रुति सी
यात्रा के सतत पड़ाव पर अथक आई साथ
एक खुली श्वास - निश्वास में सदियाँ समेटे
उसकी शांत संतोष सुकून
बिलगाव से दूर निश्छल मुस्कान
पल्लव से सुषिमत देख शोभा भरतेविहग लौटे जाते निज बसेरे
लहरें सागरतट को रज को छू जाती
परिपक्व सी शांत
न व्याकुल पल न कोई चिंता
दीप्त साँवला सांध्य प्रकाश
बंसी का स्वर मधुर प्यारा
विहान का नीलांबर पीलाभ को समेटे
चुपचाप आ जाता गोधूलि की धूल उड़ाता
वृंदावन गोकुल का ग्वाला कनेर कुण्डल वाला

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