संदेश

ओ मेरे कृष्णा ओ मेरे रामा

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जब मैंने मन से पुकारा  तुम आए बनके सहारा ओ मेरे कृष्णा ओ मेरे रामा हर संकट से तुमने ही हमको उबारो तुम से ही बात सारी मन की तुम ही तो एक संग साथ हमारा तुम बिन और कौन सहारा तुम बिन कासै कहूँ तुम बिन कौन जाने

वृंदावन गोकुल का ग्वाला

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सेतुबंध के उस पार क्षितिज मिलता था अवनी के दिशालोक में सबकुछ एक   दिये के प्रकाश का लाल - केसरिया बिम्ब  सागर तट के बीचोंबीच मानों अभी उदित हुआ है  क्षणभर का यह दृश्य विस्फारित , श्रुति सी यात्रा के सतत पड़ाव पर अथक आई साथ एक खुली श्वास - निश्वास में सदियाँ समेटे उसकी शांत संतोष सुकून    बिलगाव से दूर निश्छल मुस्कान

क्यों साँवरों ?

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जब शब्द  हारे कुछ  कहना  न  जाने मुख  बोल  न  कभी  पहचाने तुम  तब  भी  समझ  लेते मेरी  सारी  बातें

कृष्ण रंग रंगी श्याम रंग रंगी

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कृष्ण  रंग  रंगी  श्याम  रंग  रंगी मोहन  मन  भायो हृदय कमल  हर्षायो चरण  की  शोभा शोभा  अधरन - मुरलीधरन लटायें  काली -  घुंघराली ले  लुकटी  गइयाँ  चरावत खेलत  ग्वाल बाल सब सखियन  संग

जय श्री राधा राधा ।।

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 श्री राधा राधा ।। श्री राधा कृष्णाय नमः ।। 🙏🙏 नमस्कार 🙏 श्रीराधाकृष्ण के कमलचरणों का ध्यान करते हुए हम अपने आज के इस लेख की शुरुआत करते है भगवान का ध्यान हममें एक सकरात्मक ऊर्जा को जागृत करता है जो किसी भी कार्य को पूरी निष्ठा के साथ प्रतिपादन कर उसे अमल तक पहुँचाने में प्रारंभ से अंत तक साथ देता है ।

प्रिय नयन निहारे

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श्याम वेशधारी रजत अ.. घुतिमान चंद्रप्रभा शोभा हे हिमांशु निशा में विचरते उजियारे शीतल सम शांत फुहारें ओस बूँद तुषारे ज्यों करुणा का प्रेम मुदित रिलमिल- झिलमिल  मोती बरसा

श्याम संध्या दीप जलाए

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श्याम संध्या दीप जलाए  अस्ताचल सूर्य सागर अंक अब विश्राम पाये  दिन का ताप उतरा शीतल हवा का झोंका धीरे से बह निकला अस्फुट ध्वनि कुछ सहज हुई निस्तब्ध शांत में एक गहन वार्ता थी

मेरे मन तुम राधे - राधे जपा करो

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उदास  न  रहा  करो  ,  मेरे  मन  तुम  राधे - राधे  जपा  करो । इधर - उधर  व्यर्थ  न  जग  में   भटका  करो , मेरे  मन  तुम  सदा  श्रीचरणों  में  रहा  करो  ।। न  लोभ   ईर्ष्या  कोई  ,  न  कटुता  में   रहा  करो  मेरी  जिह्वा  तुम मिश्री  से  मीठा  नाम  राधे - राधे  बोला  करो ।।