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राधा राधा

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परम पुनीता राधा राधा  सरस किशोरी राधा राधा जीवन की धारा राधा राधा  प्रेम की बानी राधा राधा हमारी स्वामिनी राधा राधा  बरसाने वृंदावन वाली राधा राधा भक्ति की धारा राधा राधा  हमारी  प्रिया  श्री राधा राधा हमारी तारणहारा राधा राधा  श्यामाप्यारी राधा राधा 

कृष्ण का चिर साथ होगा

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भविष्य के गर्त में क्या होगा ? यह मुझे नहीं पता मेरा रास्ता मेरा अभी  मेरा अनमोल वर्तमान है जहाँ दुख - सुख , लाभ - हानि जय - पराजय , यश - अपयश  इन सबका भार नहीं है मेरे सारथि मेरे कृष्ण  एक ऐसे साथ है   जिन्होंने हर दुविधाओं में मुझे मार्ग दिखाया है अतीत के क्षणों का दुख नहीं भविष्य के गह्वर लोक की फ्रिक नहीं कर्म समर्पित हो , नेह की रीत हो अब चाहे जो भी , और जैसा भी हो समान भाव स्वीकार की मुस्कान होगी विचलन की हार न होगी , सत् का नाम  और हिये में सिर्फ और सिर्फ कृष्ण का चिर साथ होगा ।

कृष्ण कन्हैया बंसी बजावे

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कृष्ण कन्हैया बंसी बजावे गोकुल का ग्वाला चितचोर कहावे रास रचावै , अपनी कानी उंगली पर गोवर्धन उठावे मन में रहता , श्वासों में बसता वो गिरधर श्याम प्यार   ओ यशोदा का लाला लागे है सबकी आँखन को तारा कृष्ण कन्हैया बंसी बजैया मनमोहन चितचोर कहावे आनंद के साँवरे सृंगार कहावे हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे ।  

ओ मेरे कृष्णा ओ मेरे रामा

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जब मैंने मन से पुकारा  तुम आए बनके सहारा ओ मेरे कृष्णा ओ मेरे रामा हर संकट से तुमने ही हमको उबारो तुम से ही बात सारी मन की तुम ही तो एक संग साथ हमारा तुम बिन और कौन सहारा तुम बिन कासै कहूँ तुम बिन कौन जाने

वृंदावन गोकुल का ग्वाला

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सेतुबंध के उस पार क्षितिज मिलता था अवनी के दिशालोक में सबकुछ एक   दिये के प्रकाश का लाल - केसरिया बिम्ब  सागर तट के बीचोंबीच मानों अभी उदित हुआ है  क्षणभर का यह दृश्य विस्फारित , श्रुति सी यात्रा के सतत पड़ाव पर अथक आई साथ एक खुली श्वास - निश्वास में सदियाँ समेटे उसकी शांत संतोष सुकून    बिलगाव से दूर निश्छल मुस्कान

क्यों साँवरों ?

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जब शब्द  हारे कुछ  कहना  न  जाने मुख  बोल  न  कभी  पहचाने तुम  तब  भी  समझ  लेते मेरी  सारी  बातें

कृष्ण रंग रंगी श्याम रंग रंगी

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कृष्ण  रंग  रंगी  श्याम  रंग  रंगी मोहन  मन  भायो हृदय कमल  हर्षायो चरण  की  शोभा शोभा  अधरन - मुरलीधरन लटायें  काली -  घुंघराली ले  लुकटी  गइयाँ  चरावत खेलत  ग्वाल बाल सब सखियन  संग

जय श्री राधा राधा ।।

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 श्री राधा राधा ।। श्री राधा कृष्णाय नमः ।। 🙏🙏 नमस्कार 🙏 श्रीराधाकृष्ण के कमलचरणों का ध्यान करते हुए हम अपने आज के इस लेख की शुरुआत करते है भगवान का ध्यान हममें एक सकरात्मक ऊर्जा को जागृत करता है जो किसी भी कार्य को पूरी निष्ठा के साथ प्रतिपादन कर उसे अमल तक पहुँचाने में प्रारंभ से अंत तक साथ देता है ।

प्रिय नयन निहारे

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श्याम वेशधारी रजत अ.. घुतिमान चंद्रप्रभा शोभा हे हिमांशु निशा में विचरते उजियारे शीतल सम शांत फुहारें ओस बूँद तुषारे ज्यों करुणा का प्रेम मुदित रिलमिल- झिलमिल  मोती बरसा

श्याम संध्या दीप जलाए

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श्याम संध्या दीप जलाए  अस्ताचल सूर्य सागर अंक अब विश्राम पाये  दिन का ताप उतरा शीतल हवा का झोंका धीरे से बह निकला अस्फुट ध्वनि कुछ सहज हुई निस्तब्ध शांत में एक गहन वार्ता थी

मेरे मन तुम राधे - राधे जपा करो

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उदास  न  रहा  करो  ,  मेरे  मन  तुम  राधे - राधे  जपा  करो । इधर - उधर  व्यर्थ  न  जग  में   भटका  करो , मेरे  मन  तुम  सदा  श्रीचरणों  में  रहा  करो  ।। न  लोभ   ईर्ष्या  कोई  ,  न  कटुता  में   रहा  करो  मेरी  जिह्वा  तुम मिश्री  से  मीठा  नाम  राधे - राधे  बोला  करो ।।

शरद पूर्णिमा का चाँद

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शरद पूर्णिमा का चाँद  उतरी चाँदनी सागर तल में धीरे - धीरे प्रशांत जल में समाती शुभता का रुप कोई  श्वेत चंदन वर्ण गमक उठी भावों की महक निज मन की फुलवारी सघन निविड़ के अंधियारे में ओट लिए  राग यमन का गान गुँजन करता चंचल मन के तार  देख दृश्य पार मोती का रंग एक आकार गोल कुंदक - सा चन्द्रमा

वही कृष्ण कहलाता

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प्रकीर्ण किरण चंचल झलकाता श्यामल नीला आँचल सरोवर के क्रोड में जीवनामृत प्यास  प्रवाहित युगधारा बनकर पवन सुहानी संदेशा वह लाती झुकी तरुवर डाली   विनय का संदेश सुनाती
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जीवन बेला सुवास सुरभित  दुर्दम में भी जिजीविषा अदम्य  शुष्क उछाहों में सदैव  अपनी मृदुल भावना से पूरित  प्रसारित करता  भीनी - भीनी

ओ कृष्ण प्यारे

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ओ  कृष्ण  प्यारे  गोकुल  के  ग्वाले  नंददुलारे  बंसी  बजाओ ,  छायी  निराशा  सोई   निस्तब्धता  अब  पल प्रतिपल  घनेरी  दीप   आशा   का   फिर   मन -  मंदिर   में   जलाओ । मनप्राण   खोए    हुए   है  ,  अवरुध्द   जीवन  गति -  लय विकसे   कमल  ,   कमलनयन   क्यों   अदृश्य

कान्हा मनमोहना बंसी बजाए

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कान्हा   मनमोहना  बंसी  बजाए  ...  मनमोहना  बंसी  बजाए  मन  की  प्रीत  साची , समीरण  में  मिल  शीतलता कान्हा  बंसी  का  स्वर  गूँजे - गूँजे  रहे - रहकर

अखंड अमर सौभाग्य सिंदूर

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बेअटके सवालों में खो गए उत्तर सख्त दीवारों में घड़ी की टकटक खामोशी को ओर भी रह - रहकर  गंभीर गहन बनाए  कौन खाली बाँस को इस योग्य बनाए  कौन फिर एक बार बंसी मीठी बजाए